बलूचिस्तान: स्वतंत्र राष्ट्र की ओर संघर्ष
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
बलूचिस्तान, जो 1947 में पाकिस्तान में शामिल हुआ, तब से ही राजनीतिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक उपेक्षा का शिकार रहा है। 1970 के दशक में पाकिस्तान ने बलूच विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया, जिसमें हजारों लोग मारे गए और लाखों प्रभावित हुए। इस संघर्ष की जड़ें आर्थिक शोषण, संसाधनों की लूट, और मानवाधिकार उल्लंघनों में हैं।
2. वर्तमान स्थिति: 2025 में बलूच आंदोलन
मई 2025 में, बलूच नेताओं ने “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” की घोषणा की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन की अपील की। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने “ऑपरेशन हेरोफ 2.0” के तहत पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर 78 समन्वित हमले किए, जिससे पाकिस्तान की पकड़ केवल क्वेटा तक सीमित रह गई है।
3. भारत के लिए संभावित लाभ
रणनीतिक लाभ: बलूचिस्तान की स्वतंत्रता से पाकिस्तान की सामरिक स्थिति कमजोर होगी, जिससे भारत को क्षेत्रीय संतुलन में बढ़त मिल सकती है।
CPEC पर प्रभाव: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) बलूचिस्तान से होकर गुजरता है। स्वतंत्र बलूचिस्तान से इस परियोजना पर प्रभाव पड़ेगा, जिससे भारत को भू-राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
मानवाधिकार समर्थन: भारत बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर नैतिक बढ़त हासिल कर सकता है।
4. संयुक्त राष्ट्र में स्थिति
फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट ने संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की अपील की है, जिसमें उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन की स्थापना और पाकिस्तानी सेना की वापसी की मांग की है। हालांकि, अभी तक संयुक्त राष्ट्र ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
5. पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति
पाकिस्तान आंतरिक अस्थिरता, आर्थिक संकट, और बलूचिस्तान में बढ़ते विद्रोह से जूझ रहा है। बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों, जैसे कि जबरन गायब करना और सैन्य अत्याचार, ने जनता में असंतोष को बढ़ाया है।
निष्कर्ष
बलूचिस्तान का स्वतंत्रता आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समर्थन और क्षेत्रीय राजनीति की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह रणनीतिक, नैतिक और कूटनीतिक रूप से इस स्थिति का लाभ उठाए, जबकि पाकिस्तान को आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।







